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Sunday, 28 September 2014

नवरात्र का संदेश

 कठिनाइयों से हारने के बजाय उनसे संघर्ष किया जाए
हर व्यक्ति में शक्ति होती है, लेकिन वह प्रकट तब होती है, जब कठिनाइयों से हारने के बजाय उनसे संघर्ष किया जाए। उसी व्यक्ति को विजय मिलती है। यही नवरात्र का संदेश है।संसार का प्रत्येक कार्य किसी न किसी शक्ति द्वारा ही संचालित होता है। शक्ति का शाब्दिक अर्थ है- सामर्थ्य। शास्त्रों में कहा गया है कि दुर्बलता सबसे बड़ा अभिशाप है। इसका अर्थ यह भी है कि शक्ति सबसे बड़ा वरदान है। यही कारण है कि वेदों में समस्त शक्तियों की केंद्रीभूत सत्ता अर्थात सर्वोच्च शक्ति प्रकृति को कहा गया है।

प्रकृति की शक्ति को सभी जानते हैं। समय-समय पर प्रकृति की विकरालता का सामना कभी जल प्रलय के रूप में, तो कभी सूखे और भूकंप के रूप में हमने देखा है। पुराणों में इसी प्रकृति अथवा शक्ति को पराशक्ति, योगमाया आदि नामों से अभिव्यक्त किया गया है। यही शक्ति उस देवी के रूप में जानी जाती हैं, जिनकी उपासना में दुर्गासप्तशती में लिखा है - या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
प्रकृति की शक्ति ही हमारी सबकी प्रकृति में भी सन्निहित होती है, बस आवश्यकता है उसे पहचानने की। नवरात्र में शक्ति उपासना के बहाने अपने भीतर की तीन शक्तियों इच्छाशक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति को जगाने का प्रयास होता है। इन्हीं तीन शक्तियों को महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली का रूप दिया गया है।
स्कंदपुराण का कथन है कि जो शक्ति के संग होता है, वह शिव के समान है, वहीं जो शक्तिविहीन है, वह शव के समान है। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति, तीनों शक्तियों के योग को हमारी पौराणिक संस्कृति ने नाम दिया है-दुर्गा।
नवरात्र अपने भीतर की शक्तियों को जाग्रत करने का आज्जान है। हमारे भीतर इच्छाशक्ति नहीं है, तो हम किसी भी काम की शुरुआत नहीं कर सकते। ज्ञान शक्ति नहीं है, तो उस काम को बेहतर तरीके से आगे नहीं बढ़ा सकते। यदि हमारे पास क्रिया शक्ति नहीं है, तो उस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न नहीं कर सकते। इन्हीं शक्तियों को जाग्रत करने का अवसर देता है नवरात्र का पर्व।
महाशक्ति दुर्गा के इस रूप को सर्वत्र देखा जा सकता है। दुर्गा समस्त प्राणियो में चेतना, बुद्धि, स्मृति, धृति, शक्ति, श्रद्धा, कांति, तुष्टि, दया आदि अनेक रूपों में स्थित हैं। दुर्गा सप्तशती में इन सभी रूपों की उपासना की गई है। मार्कडेय पुराण में देवी के नौ रूप शैलपुत्री, ब्रहमचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री बताए गए हैं।
शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा के जितने भी रूप हैं, उन्हें संघर्ष करते हुए दिखाया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रत्येक मनुष्य में शक्ति है, लेकिन वह प्रकट तब होती है, जब हम कठिनाइयों से हिम्मत हारने के बजाय उससे संघर्ष करें। उसी व्यक्ति को विजयश्री प्राप्त होती है।
आश्विन माह दो ऋतुओं का संधिकाल है। आयुर्वेद में कहा गया है कि ऋतु परिवर्तन के दौरान वात, कफ और पित्त को उपवास रखकर संतुलित किया जा सकता है। इसीलिए नवरात्र में उपवास की प्रथा है।

आइए इस पावन पर्व पर हम इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति को जाग्रत करें, ताकि कठिन परिस्थितियों के असुरों से मुकाबला कर सकें।

देवी के नौ रूपों के आराधना का पर्व


देवी के नौ रूपों के आराधना का पर्व 

नवरात्र कोपूर्ण ब्रह्मांड दैवी शक्ति से संचालित हो रहा है। नवरात्र के नौ दिन इसी शक्ति की आराधना का विशेष पर्व काल हैं। सभी अंकों में नौ (9) को सर्वाधिक ऊर्जावान माना जाता है। त्रिगुणात्मक सृष्टि के संचालन के लिए ही महाशक्ति ने सरस्वती, लक्ष्मी और काली का रूप धारण किया है। आगे इनका विस्तार नवदुर्गा के रूप में हुआ, जो इस प्रकार है -

1. शैलपुत्री - मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं। वृषभ स्थिता (बैल पर विराजमान) इन देवी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं में कमल पुष्प सुशोभित है। यह पर्यावरण और प्रकृति को संरक्षण प्रदान करती हैं।
2. ब्रह्मचारिणी - मां का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी है। इनका यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय है। इनके दाहिने हाथ में जपमाला एवं बाएं में कमंडल रहता है। इनकी उपासना से प्राणी के अंदर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।
3. चंद्रघंटा - मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है और इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। इनकी उपासना से वीरता एवं विनम्रता का विकास होता है।
4. कूष्मांडा- मां का दुर्गा का चौथा स्वरूप कूष्मांडा है। ऐसी मान्यता है कि इनकी मंद हंसी द्वारा ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी। इसीलिए इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा गया। इनकी आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, अमृत-कलश, शंख, चक्त्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।
5. स्कंदमाता- भगवान स्कंद की माता होने के कारण मां दुर्गा को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। इनका वाहन भी सिंह है और इनकी चार भुजाएं हैं। स्कंदमाता को सृष्टि की पहली प्रसूता स्त्री माना जाता है। इनकी उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं।
6. कात्यायनी- मां के छठे स्वरूप को कात्यायनी नाम से पुकारा जाता है। इनका वाहन सिंह है और इनकी चार भुजाएं हैं। यह देवी अमोघ फल देने वाली हैं। इनकी उपासना से रोग, शोक और भय नष्ट हो जाते हैं। महिषासुर राक्षस का वध करने के कारण इनका एक नाम महिषासुर मर्दिनी भी है।
7. कालरात्रि- मां कालरात्रि का स्वरूप काला है, लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम शुभकरी भी है। इनकी उपासना से प्राणी सर्वथा भय मुक्त हो जाता है।
8. अष्टम महागौरी- मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। यह गौरवर्ण की हैं। ऐसा माना जाता है कि कठोर तपस्या करने से इनका रंग काला पड गया था। जब शिवजी ने इन पर गंगाजल छिड़का तो यह पूर्णत: गौरवर्ण की महागौरी हो गई। इनकी चार भुजाएं हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनकी उपासना सौभाग्य देने वाली है। मां महागौरी साधक को अलौकिक शक्ति प्रदान करती हैं।

9. नवम सिद्धिदात्री- मां का नौवां स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। इनका वाहन सिंह है, पर ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें शंख, चक्र, गदा और कमल पुष्प है। इनकी उपासना करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। नवरात्र में मां के इन स्वरूपों की पूजा नौ दिन करने से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय होता है और इससे भक्तों की इच्छाशक्ति भी दृढ होती है।