कठिनाइयों से हारने के बजाय उनसे संघर्ष किया जाए
हर व्यक्ति में शक्ति होती
है, लेकिन वह प्रकट
तब होती है, जब
कठिनाइयों से हारने के
बजाय उनसे संघर्ष किया
जाए। उसी व्यक्ति को
विजय मिलती है। यही
नवरात्र का संदेश है।संसार का प्रत्येक कार्य
किसी न किसी शक्ति द्वारा ही
संचालित होता है। शक्ति
का शाब्दिक अर्थ है- सामर्थ्य। शास्त्रों में
कहा गया है कि
दुर्बलता सबसे बड़ा अभिशाप
है। इसका अर्थ यह
भी है कि शक्ति
सबसे बड़ा वरदान है।
यही कारण है कि
वेदों में समस्त शक्तियों
की केंद्रीभूत सत्ता अर्थात सर्वोच्च
शक्ति प्रकृति को कहा गया
है।
प्रकृति की शक्ति को
सभी जानते हैं। समय-समय पर प्रकृति
की विकरालता का सामना कभी
जल प्रलय के रूप
में, तो कभी सूखे
और भूकंप के रूप
में हमने देखा है।
पुराणों में इसी प्रकृति
अथवा शक्ति को पराशक्ति,
योगमाया आदि नामों से
अभिव्यक्त किया गया है।
यही शक्ति उस देवी
के रूप में जानी
जाती हैं, जिनकी उपासना
में दुर्गासप्तशती में लिखा है
- या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
प्रकृति की शक्ति ही
हमारी सबकी प्रकृति में
भी सन्निहित होती है, बस
आवश्यकता है उसे पहचानने
की। नवरात्र में शक्ति उपासना
के बहाने अपने भीतर
की तीन शक्तियों इच्छाशक्ति, ज्ञान
शक्ति और क्रिया शक्ति
को जगाने का प्रयास
होता है। इन्हीं तीन
शक्तियों को महालक्ष्मी, महासरस्वती और
महाकाली का रूप दिया
गया है।
स्कंदपुराण का कथन है
कि जो शक्ति के
संग होता है, वह
शिव के समान है,
वहीं जो शक्तिविहीन है,
वह शव के समान
है। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति, तीनों
शक्तियों के योग को
हमारी पौराणिक संस्कृति ने नाम दिया
है-दुर्गा।
नवरात्र अपने भीतर की
शक्तियों को जाग्रत करने
का आज्जान है। हमारे
भीतर इच्छाशक्ति नहीं है, तो
हम किसी भी काम
की शुरुआत नहीं कर
सकते। ज्ञान शक्ति नहीं
है, तो उस काम
को बेहतर तरीके से
आगे नहीं बढ़ा सकते।
यदि हमारे पास क्रिया
शक्ति नहीं है, तो
उस कार्य को सफलतापूर्वक
संपन्न नहीं कर सकते।
इन्हीं शक्तियों को जाग्रत करने
का अवसर देता है
नवरात्र का पर्व।
महाशक्ति दुर्गा के इस
रूप को सर्वत्र देखा
जा सकता है। दुर्गा
समस्त प्राणियो में चेतना, बुद्धि,
स्मृति, धृति, शक्ति, श्रद्धा,
कांति, तुष्टि, दया आदि
अनेक रूपों में स्थित
हैं। दुर्गा सप्तशती में
इन सभी रूपों की
उपासना की गई है।
मार्कडेय पुराण में देवी
के नौ रूप शैलपुत्री, ब्रहमचारिणी, चंद्रघंटा,
कूष्मांडा स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री बताए
गए हैं।
शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा के
जितने भी रूप हैं,
उन्हें संघर्ष करते हुए
दिखाया गया है। इसका
अभिप्राय यह है कि
प्रत्येक मनुष्य में शक्ति
है, लेकिन वह प्रकट तब
होती है, जब हम
कठिनाइयों से हिम्मत हारने
के बजाय उससे संघर्ष
करें। उसी व्यक्ति को
विजयश्री प्राप्त होती है।
आश्विन माह दो ऋतुओं
का संधिकाल है। आयुर्वेद में
कहा गया है कि
ऋतु परिवर्तन के दौरान वात,
कफ और पित्त को
उपवास रखकर संतुलित किया
जा सकता है। इसीलिए
नवरात्र में उपवास की
प्रथा है।
आइए इस पावन पर्व
पर हम इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और
क्रियाशक्ति को जाग्रत करें,
ताकि कठिन परिस्थितियों के
असुरों से मुकाबला कर
सकें।

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