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Wednesday, 24 September 2014

नवरात्र के पहले हजारों लोगों ने नौ दिनी व्रत का संकल्प लिया

मां बाला त्रिपुर सुन्दरी जगदम्बा मंदिर में आनेवाले भक्तों के मन की मुरादें होती है पूरी
 लखीसराय।


वासंतिक नवरात्र के पहले दिन अंचलों में पर्व का उल्लास उफान पर है । हर घरों में कलश स्थापना और पूजन अनुष्ठान की तैयारी जोरो पर है । श्रद्धालुओं के लिए अपने आराध्य देव की पूजा करना अंतर्मन से उस देवी या देवता का साक्षात दर्शन करने से कम नहीं होता। शक्तिधाम मां बाला त्रिपुर सुन्दरी जगदम्बा मंदिर में नवरात्र के पहले हजारों लोगों ने नौ दिनी व्रत का संकल्प लिया है। बड़े बुजुर्गो के साथ युवाओं ने भी एक दिनी उपवास रखने का निर्णय लिया है। घरों में मुहूर्त के अनुसार वेदी सजाकर कलश स्थापित करने की तैयारी जारी है। स्वयं सप्तशती का पाठ करेगें या इसके लिए पुरोहित भी बुलाए जा सकते है। परिवारजनों के साथ पूरी श्रद्धा-विश्वास से पूजा आराधना की जायेगी । मां बाला त्रिपुर सुन्दरी जगत जननी जगदम्बा मंदिरों में  आज से फ़ूलों की सजावट शुरू कर दिया गया है  

मंदिर में पूजा अर्चना करने उमड़ी भीड़
जिले के बड़हिया की विख्यात शक्तिधाम मां बाला त्रिपुर सुन्दरी जगदम्बा मंदिर में प्रत्येक मंगलवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है ।दूर दराज के क्षेत्रों से आये हजारों महिला एवं पुरूष श्रद्धालुओं ने माता की पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगते है ।ऐसी मान्यता है कि जो भी मां के दरबार में आकर सच्चे मन से मां से मन्नत मांगता है।मां अपने भक्तों की मुरादें अवश्य पूरी करती है।तभी तो दिन प्रतिदिन मां के दरबार में उपस्थित होकर पूजा अर्चना करनेवालों की संख्या में दिन प्रतिदिन भारी बढ़ोतरी हो रही है।
सर्पदंश पीडित को भी इस मंदिर में मिलता है नया जीवन
इतिहासकारों का मानना है कि जम्मू कश्मीर में माता वैष्णो देवी के संस्थापक श्रीधर ओझा ने ही बड़हिया में मॉ जगदम्बा की स्थापना की थी।बड़हिया में गंगातट पर तपस्या के दौरान एक दिन माता ने भक्त श्रीधर ओझा को स्वप्न में दर्शन दिये और कहा कि मैं सुबह में मृतिका पिंड के रूप में गंगा में प्रवाहित होते हुए तुम्हें दर्शन दूंगी।तुम उस मृतिका पिंड के रूप में विराजमान मेरे पिंड को गंगा के तट पर स्थापित कर देना।दूसरे दिन श्रीधर ओझा को सचमुच में मृतिका पिंड के रूप में गंगा में प्रवाहित होते माता के अंश के दर्शन हुए और उन्होने पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना के उपरान्त मां के उस पिंड को गंगातट पर स्थापित कर दिया।उस समय बड़हिया में सर्प का अत्यधिक प्रकोप था।बड़ी संख्या में लोग सर्प दंश के कारण काल के गाल में समा जाते थे।माता की स्थापना के उपरान्त मां ने जब उन्हें साक्षात दर्शन दिये तो भक्त श्रीधर ओझा ने बड़हियावासियों को सर्प के आतंक से मुक्ति दिलाने की करवद्ध प्रार्थना की।मां ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि आज से बड़हिया के मूलवासी लोग एक हाथ से हमारे मंदिर के कुंए का जल निकालकर हरा हरा दोष विष निर्विष दोहाय त्रिपुरसुन्दरी के आज्ञा श्रीधर ओझा के मंत्र के जाप के साथ सर्पदंश पीड़ित व्यक्ति को पिला देगा,उसे सर्पदंश से मुक्ति मिल जायेगी।तब से लेकर आजतक इस मंदिर में सर्पदंश के पीड़ित लोग माता के मंदिर आते हैं और मंत्र के साथ कुंए का जल पीकर तथा स्नान कर स्वस्थ होकर अपने अपने घर जाते हैं।माता का आशीर्वाद आज भी उतना ही फलदायी है।

 वर्तमान में मां के भक्तों के सहयोग से माता का बिहार का सबसे उंचा सफेद संगमरमर के मंदिर का निर्माण कराया गया है तथा दूर दराज से आये भक्तों के ठहरने के लिए एक बहुत ही बड़ा तीनमंजिला धर्मशाला का भी निर्माण कराया गया है।जहां भक्तगण आकर ठहरते हैं।ऐसे तो मां के दर्शनार्थ प्रतिदिन आनेवाले भक्तों का मेला लगता है।मगर हर मंगलवार और शनिवार को भक्तों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है।भक्तों की भीड़ को नियंत्रित करने तथा उन्हें पंक्तिवद्ध कराकर माता के जयकारों के साथ दर्शन कराने में मंदिर समिति को विशेष इन्तजाम करने पड़ते हैं।महिलाओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए महिला कालेज की एनएसएस छात्राएं तथा महिला मंडली के विशेष दस्तों को भी जिम्मेदारी दी जाती है। मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन है।
हर तरफ़ वैदिक मंत्रोच्चारण से वातावरण भक्तिमय है माता की स्तुतियों का मधुर स्वर से मन प्रफ़ुल्लित हो उठता है

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते


माता की महिमा अत्यन्त निराली है और भक्तों को मनवांछित फल देनेवाली है।

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