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Sunday, 3 November 2013

दीपावली

दीपावली की रात दीया-बाती के बाद एक अलग दीया बारने और उसे घंट (घंटे की आकृति का माटी का पात्र) से ढककर पवित्र काजल पारने की एक पुरानी प्रथा काशी और उसके आसपास के क्षेत्रों में आज भी बदस्तूर निभाई जा रही है।

हालांकि 'आई लाइनर' के युग में काजल का पूछनहार कौन है मगर इसे 'अखंड ज्योति' का शुभ और मांगलिक उपहार मान कर साल भर कजरौटे में सहेजे रखने की मान्यता इस रिवाज को अब भी जिलाए हुए है। दुनिया भर की मनाहियों के बाद भी हर घर में बबुआ-बबुनी (शिशुओं) के गाल और भाल पर डिठौना लगाने की रस्म आज भी जिंदा है। जो इस पवित्र काजल के बिना संभव ही नहीं है। दूल्हे राजा सूट में हों या शेरवानी में परिछन के समय मां और भाभियां बगैर काजर पारे भला छोड़ेंगी क्या? बनारस में अब भी विवाह के बाद वर-वधू जब गंगा पुजइया के लिए निकलते हैं तो बहू के हाथ में सिन्होरे (सिंदूरदान) के बाद दूसरा मंगल प्रतीक दीपावली की रात में पारे गए पवित्र काजल का कजरौटा ही होता है।

कैसे पारते हैं काजल - दीपावली की रात दीपदान के बाद घर की बुजुर्ग महिलाओं की अगुवाई में बहुएं पूजन वेदिका के सामने एक बड़े दीये और मोटी बाती वाला अखंड दीप जलाती हैं। इस दीपक में प्राय: घी या कड़ुआ तेल का उपयोग किया जाता है। दीपक के पूजन के बाद उसे घंट से ढक दिया जाता है। सुबह होने तक घंट में शुद्ध काजल की कई पर्ते उतर चुकी होती हैं। बाद में इसे कजरौटे में भर दिया जाता है।

कालरात्रि का यंत्र भी मंत्र भी-

लोकाचारों से गहरे तक जुड़ा दीपावली का काजल आध्यात्मिक दृष्टि से यंत्र भी है और मंत्र भी क्यों कि यह तीन विशिष्ट रात्रियों महारात्रि, मोहरात्रि और कालरात्रि में से सबसे सिद्ध कालरात्रि(दीपावली) का उपहार है। पहले जब लोग काजल लगाते थे तब उसके पीछे मूल भाव यह हुआ करता था कि दीपावली के दीयों की ज्योति की तरह उनकी नेत्र ज्योति भी हमेशा दप-दप रहे। अब जब काजल लगाने को ले कर तरह-तरह के तर्क हैं तब भी मंगल प्रतीक के रूप में ही सही इस रस्म को जिंदा रखना इस लिए जरूरी है कि आने वाली पीढ़ी कम से कम '' से काजल और '' से कजरौटे को तो पहचान सके।

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