बिहार सरकार के पशु एवं मतस्य विभाग के मंत्री गिरिराज सिंह का गृह जिला लखीसराय है। वो यहां मतस्य पालन के लिए लखीसराय को बिहार का हब बनाने की परिकल्पना किया है। ज्ञात हो कि यहां 205 तालाब है। जिसमें जिला मुख्यालय में 52 तालाब है।
जहां मात्र 4 तालाब में मतस्य पालन के लिए मछली का बीर्यजीरा डाला गया है। बाकी सभी तालाब में सिंघाडा की फसल उगाया जा रहा है। कुछ तालाब को मंत्री जी द्वारा नये सिरे से नया तालाब का निर्माण करवाया जा रहा है। और उसमें खुदाई के नामपर पानी डालने के नामपर रूपया की बन्दरबांट अधिकारीयों के मिलीभगत से किय ा जा रहा है। जबकी पहले से जिलाभर में 205 तालाब अपडेट है फिर भी नया तालाब बनाया जा रहा है। मछली पालन के नामपर बिहार में बहुत बडी घोटाला का उजागर हो सकता है।
मत्स्य विभाग के मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के तमाम प्रयासों के बावजूद लखीसराय जिला इस मामले में फिसड्डी साबित हो रहा है। जिले में मछली का वार्षिक खपत 56,041 क्विंटल है। परंतु यहां मात्र 4,500 क्विंटल ही मछली का वार्षिक उत्पादन हो पा रहा है। इस तरह आंध्रप्रदेश सहित अन्य प्रदेशों से 51,541 क्विंटल वार्षिक चलानी मछलियां मंगाकर भरपाई की जा रही है। लोग दस से पंद्रह दिन की रखी मछलियों का सेवन कर कई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
वहीं ताजी व सुस्वादु मछलियां लोगों की थाली से दिनानुदिन दूर होती जा रही है। कहने को तो जिले में गंगा नदी सहित किऊल, हरोहर, गरखै के अलावे सैकड़ों तालाब हैं। परंतु नदियों एवं तालाबों में मछलियों की संख्या में कमी होती जा रही है। बाजारों में अब यदा-कदा ही ताजी मछलियां देखने को मिलती है। यही स्थिति कमोवेश पूरे बिहार की है। पूरे बिहार में मछली की वार्षिक खपत 05.20 लाख टन है परंतु वार्षिक उत्पादन मात्र 3.44 लाख टन ही है। हालांकि मत्स्य विभाग द्वारा जिले में छह वेराईटी की मछलियों का उत्पादन करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है जिसमें तीन देसी भेराईटी रेहू, कतला एवं नैनी (मिगरगल) एवं तीन विदेशी भेराईटी ग्रास, सिल्वर एवं कॉमन कार्प शामिल है।
इसके अलावे पंगेसिएस मत्स्य पालन योजना के तहत जिले में 43 एकड़ तालाब में पंगेसिएस मछली उत्पादन करने की तैयारी की जा रही है। मत्स्य प्रसार पदाधिकारी रणजीत कुमार की मानें तो आने वाले समय में जिले में 4,500 क्विंटल से बढ़कर 9,220 क्विंटल वार्षिक मछली का उत्पादन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि फसल की सुरक्षा को ले फसलों में किए गए कीटनाशी दवा एवं रासायनिक उर्वरक का प्रयोग मछली के लिए घातक साबित हो रहा है। कीटनाशी एवं रासायनिक उर्वरक का प्रभाव जमीन में रह जाता है जो बरसात के दिनों में पानी के साथ बहकर नदी एवं तालाब में चली जाती है। कीटनाशी दवा एवं रासायनिक उर्वरक के प्रभाव से नदी एवं तालाब में मछलियों के अंडे नष्ट हो जाते हैं। जिससे मछलियों के उत्पादन में कमी होती जा रही है।
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