मकर संक्रांति के मौके पर तिल का सेवन करना परम्परा रही है। वैज्ञानिक कारणों व धार्मिक आस्था से तिल जुड़ा है। मकर रेखा पर सूर्य के जाने के कारण संक्रमण काल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में तिल शरीर में सामंजन क्षकता प्रदान कर हमें उस संक्रमण से निपटने की ताकत प्रदान करता है। इस समय शीतकाल उष्ण परिस्थिति की ओर अग्रसर होता है। ऐसे परिवर्तन से मानव शरीर को समायोजित करने के लिए वसायुक्त तिल का सेवन जरुरी होता है। तिल सेवन के धार्मिक कारण भी हैं। तिल संतृप्त वसा है उसमें उष्णता नहीं होती है। भगवान सूर्य को तिल अर्पण प्रिय माना जाता है। भगवान विष्णु और सूर्य को अक्षत नहीं तिल अर्पण करना धार्मिक आस्था है। उन्हें अक्षत चढ़ाना वर्जित होता है। सूर्य जब मकर रेखा पर पहुंचते हैं तो तिल दान करना एवं गंगा स्नान करना अवरोही क्रम में फलदायक माना जाता है। तिल के बारे में ऐसी भी मान्यता है कि मां या घर की बुजुर्ग महिला अक्षत, गुड़ और तिल मिश्रित प्रसाद अपने बच्चों के हाथों में देती है। अपेक्षा रखती है कि अंतिम क्षण तक हमें सहयोग और सेवा प्राप्त हो। यही कारण है कि मकर संक्रांति पर तिल का अत्यधिक सेवन किया जाता है और इस त्योहार को लोग तिल सकरात कहते हैं।
मकर संक्रांति पर खरीदारी को लेकर रविवार को बाजार में भीड़ उमड़ पड़ी। चूड़ा-तिलकुट एवं सब्जी की दर्जनों नई दुकानें खुल गई थी। रविवार होने के बावजूद बाजार की रौनक काफी बढ़ी हुई थी। इस त्योहार पर हर घर में आलूदम बनाए जाने की परम्परा है। इसको लेकर सब्जी के दाम बढ़ रहे। दही व तिलकूट की दुकानों का भी वही हाल था। कई लोग पूजन सामग्री की खरीदारी भी करते दिखे।आज लखीसराय जिला के ऐतिहासिक महाराजा इन्द्रदुघ्मन की किला लाली पहाडी और काली पहाडी पर मकर संक्रान्ति का मेला लगता है। लोग नदी में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। इधर खोवा युक्त तिलकूट की काफी बिक्री रही। बाजारों में कई प्रकार के तिलकूट बिक रहे हैं।

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