लखीसराय जिले के कजरा थाना का हाल बेहाल है।नक्सल प्रभावित कजरा थाना के भवन बिल्कुल जर्जर है काॅग्रेस के किराये की भवन में चल रहा है। जिसका छत खप्पडैल का है दिवार सन 1950 ई0 में मिटटी से बना हुआ है जो कभी भी धराशाही हो सकता है।उसी जर्जर भवन में पुलिस रहने से लेकर खाना-पीना तक करते है। जब कभी अपराधी को थाना में लाया जाता है। तो उसे पेड से बाॅधकर रखा जाता है। काफी परेशानीयों के बीच यहां के पुलिस डियुटी कर रहे है। गर्मी में धुप, बरसात में पानी और संसाधन की कमी के कारण पुलिस विवस है। जिला पुलिस कप्तान का जरा भी ध्यान नही है। पूर्व के इतिहास के गलियारे में जाने के बाद भी पुलिस सोया है।आमलोगों की सुरक्षा की भरोसा दिलाकर थाना प्रभारी और सभी पुलिसकर्मी स्वंय को असुरक्षित महसुस कर रहे है। इस भवन का स्थिति ठिक नहीं रहने के कारण कई तरह के रोगों का भी शिकार होना पडता हैं। नकसली, अपराधी, सर्प और विच्छु जैसे खतरनाक डर के साये में पुलिस का डियुटी करना मजबुरी हो गया है।
सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाय तो इसमें भी कजरा थाना कमजोर है। 3 साल पहले कानीमोह के जंगल में हुई मुठभेड़ में एसआइ भूलन प्रसाद यादव समेत सात पुलिस कर्मी शहीद हो गए थे।इनमें बीएमपी-10 के हवलदार नर्वदेश्वर सिंह, सिपाही सतीश कुमार, राम बाबू मिस्त्री, शैलेश कुमार, कन्हैया प्रसाद सिंह एवं मोहजीदन अंसारी शामिल हैं। चार अन्य जवानों को नक्सलियों ने बंधक बना लिया था। इस दौरान नक्सली जवानों के 30 हथियार भी अपने साथ ले गए थे। चार दिनों बाद बंधक बीएमपी के अवर निरीक्षक लुकस टेटे की भी हत्या नक्सलियों ने कर दी थी। तीन अन्य बंधकों एसआइ अभय प्रसाद यादव, पीएसआइ रूपेश कुमार सिन्हा एवं बीएमपी के हवलदार मु. एहसान खान नौंवे दिन मुक्त हुए थे। कजरा में पुलिस और नक्सलियों के बीच देश भर में सुर्खियों में रही इस मुठभेड़ वर्ष 2010 में 29 अगस्त को हुई मुठभेड़ में शामिल नक्सली एक-एक कर जेल से छूट रहे हैं। इस घटना के बाद नक्सलियों का मनोबल इतना बढ़ा कि पुलिस को चुनौती देते हुए सामानांतर शासन चला रहे हैं।जेल से जमानत पर छूटे नक्सली धड़ल्ले से ठेकेदारों से लेवी वसूल रहे हैं। पहाड़ और जंगल खनन पर भी इनका शासन है। जिला मुख्यालय स्थित पुलिस केंद्र को टारगेट कर धमकी भरा पर्चा हाल के दिनों में भी फेंका गया। ऐसे में नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस की सुस्त कार्रवाई से संगठन का विस्तार तेजी से हो रहा है। फिर भी कजरा थाना आज काॅग्रेस कार्यालय के किराये के मकान में जैसे-तैसे चल रही है। थाना का हाल बेहाल है।
बाईट-पवन कुमार झा- कजरा थानाअध्यक्ष
सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाय तो इसमें भी कजरा थाना कमजोर है। 3 साल पहले कानीमोह के जंगल में हुई मुठभेड़ में एसआइ भूलन प्रसाद यादव समेत सात पुलिस कर्मी शहीद हो गए थे।इनमें बीएमपी-10 के हवलदार नर्वदेश्वर सिंह, सिपाही सतीश कुमार, राम बाबू मिस्त्री, शैलेश कुमार, कन्हैया प्रसाद सिंह एवं मोहजीदन अंसारी शामिल हैं। चार अन्य जवानों को नक्सलियों ने बंधक बना लिया था। इस दौरान नक्सली जवानों के 30 हथियार भी अपने साथ ले गए थे। चार दिनों बाद बंधक बीएमपी के अवर निरीक्षक लुकस टेटे की भी हत्या नक्सलियों ने कर दी थी। तीन अन्य बंधकों एसआइ अभय प्रसाद यादव, पीएसआइ रूपेश कुमार सिन्हा एवं बीएमपी के हवलदार मु. एहसान खान नौंवे दिन मुक्त हुए थे। कजरा में पुलिस और नक्सलियों के बीच देश भर में सुर्खियों में रही इस मुठभेड़ वर्ष 2010 में 29 अगस्त को हुई मुठभेड़ में शामिल नक्सली एक-एक कर जेल से छूट रहे हैं। इस घटना के बाद नक्सलियों का मनोबल इतना बढ़ा कि पुलिस को चुनौती देते हुए सामानांतर शासन चला रहे हैं।जेल से जमानत पर छूटे नक्सली धड़ल्ले से ठेकेदारों से लेवी वसूल रहे हैं। पहाड़ और जंगल खनन पर भी इनका शासन है। जिला मुख्यालय स्थित पुलिस केंद्र को टारगेट कर धमकी भरा पर्चा हाल के दिनों में भी फेंका गया। ऐसे में नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस की सुस्त कार्रवाई से संगठन का विस्तार तेजी से हो रहा है। फिर भी कजरा थाना आज काॅग्रेस कार्यालय के किराये के मकान में जैसे-तैसे चल रही है। थाना का हाल बेहाल है।
बाईट-पवन कुमार झा- कजरा थानाअध्यक्ष


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