आस्था का प्रतीक महापर्व छठ पूजा मनाने का प्रचलन साढे़ तीन हजार वर्ष पूर्व से चला आ रहा है। छठ पूजा का यह लोकउत्सव कार्तिक शुक्ला चतुर्थी से आरंभ हो कर चौथे दिन सप्तमी की सुबह संपन्न होता है। इस पर्व को बहुत ही नियम पूवर्क मनाया जाता है।
इस महापर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पूजा में किसी भी मंत्र का उच्चारण नहीं होता और ना ही पंडित का सहयोग लिया जाता है। भारतीय चंद्रवर्ष [विक्रम संवत एवं शक संवत] के कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के छठे दिन बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी जो त्योहार मनाते हैं, उसे 'सूर्य छठ' अथवा 'डाला छठ' कहा जाता है। वैसे तो इस महापर्व की शुरुआत चतुर्थी तिथि को नहाया खाय से शुरू होती है और उसके अगले दिन पंचमी को व्रती बिना अन्न जल ग्रहण किए हुए शाम को खरना की पूजा करते है। इसके बाद षष्ठी के दिन शाम को अस्ताचलगामी सूर्य और सप्तमी के सुबह उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। घाटों पर भगवान भास्कर और छठी मइया की पूजा करते व्रतियों ने शहर को अध्यात्म और लोक संस्कृति के रंग में डूबो दिया। पीले वस्त्र, नहाकर गीले बदन, हाथ में फलों और ठेकुआ से भरा सूप लिए प्रकृति प्रत्यक्ष देव सूर्य को अर्घ्य देते व्रतियों ने सुख सौभाग्य की कामना की।


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