राग से विराग की ओर, विकार से विकास की ओर, असत्य से सत्य की ओर, तम से ज्योति की ओर..और तामसी प्रवृत्ति से सद्गुणों की ओर-यही उद्देश्य है उपासना और उपवास का। उपवास यानी अपने ईष्ट के करीब पहुंचना..यानी उस जैसा बनना। यह तभी मुमकिन है जबकि अपना आचरण ईष्ट जैसा बनाएंगे। इसके लिए जरूरी है तन और मन में समाए विकार को विदाई देना। तन-मन में जगह बना चुकीं व्याधि, राग-द्वेष को खुद से दूर करना। लिहाजा जरूरी है तेज रफ्तार से दौड़ती जिंदगी में तेजी से शामिल हो रहीं गैर जरूरी वस्तुओं और आदतों को पहचानें और खुद से दूर करें।
शौक की जगह त्याग और आकर्षण की जगह संयम को स्थान देकर दुनियावी और मायावी छल से बचें। फास्ट लाइफ के नाम पर बढ़े फास्ट फूड से जन्म रहीं शारीरिक विकृतियों को फलाहार रूपी एंटी आक्सीडेंट से काउंटर करें।
उपवास और व्रत सिर्फ ईश्वर को खुश करने का रास्ता ही नहीं बल्कि शरीर को फिट करने का माध्यम भी है। कम खाना और संतुलित आहार हर रूप में स्वस्थ्य शरीर के लिए जरूरी बताया गया है। उपवास के आहार की चर्चा ही फलाहार से शुरू होती है।

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