लखीसराय शहर के बीचों बीच स्थानीय के0 आर0 के0 मैदान में डी0 एल0पी0 क्लब के द्वारा देर रात 08,20 बजे जिलाधिकारी अमरेन्द्र प्र0 सिंह और एस0पी0 राजीव मिश्रा ने रावण और मेघनाद का पुतला में आतिशबाजी के सहारे आग लगाकर बुराई को खत्मकर अच्छाई का नया पहल करने का संदेश दिया ।
विजयदशमी से हमें यही संदेश मिलता है कि असत्य चाहे जितना बलवान हो उसे अंत में हारना होता है। असत्य का अंत कब होता है, इसकी शायद कोई सीमा नहीं होती, लेकिन हमारी चेतना में यह विचार हमेशा रहना चाहिए कि असत्य और बुराई की एक न एक दिन पराजय अवश्य होगी। रावण का राज आतंक, अनाचार, शोषण एवं अत्याचार का प्रतीक था, जबकि मर्यादा पुरुषोत्ताम राम सत्य, समर्पण और सेवा के मार्ग पर चल रहे थे। उन्होंने सत्य की अपनी लड़ाई में सामान्य जनमानस को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपने साथ आने के लिए आमंत्रित किया, बल्कि यह कहें कि निवेदन किया। इसके विपरीत रावण अपनी ताकत पर मतवाला था। उसने नेक सलाह भी नहीं मानी, यहां तक कि ऐसी सलाह को भी दरकिनार कर दिया जो खुद उसके जीवन के लिए महत्वपूर्ण थी। इस मार्ग पर चलते हुए रावण का पतन सुनिश्चित था। स्पष्ट है कि हमें सदाचरण से कभी दूर नहीं होना चाहिए। सदाचरण ही वह शक्ति है जो हमें अंदर से मजबूत बनाती है और यही असली ताकत भी है। बाहरी शक्तियां हम कितनी भी जुटा लें, अगर हमारा चरित्र दुर्बल है, हमें अच्छे-बुरे का अहसास नहीं है तो वे सभी वाह्य शक्तियां एक-एक कर क्षीण हो जाएंगी। अपनी गलतियों के हम सबसे बड़े सचेतक हैं। इसलिए आत्मचिंतन की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए।
भगवान राम ने संतों को आश्रय दिया, उनकी सुरक्षा की और समाज में उन्हें ऊंचा स्थान दिलाया। वह अपने जीवन में कदम-कदम पर मानवता की रक्षा के लिए अपने सुखों का बलिदान करते रहे। असुर रूपी शक्तियां हर युग में मौजूद होती हैं, उनके दमन के लिए राम जैसे चरित्र की आवश्यकता होती है। विजयदशमी से हमें यह भी सबक मिलता है कि हम किसी को छोटा और हीन न समझकर सताएं नहीं। अगर किसी गुण के कारण हमें धन प्रसिद्धि मिल भी जाए तो अपने आचरण के प्रति और सतर्क हो जाएं, क्योंकि जितना हम प्रकाश में होते हैं उतना ही अधिक लोगों की निगाह में आते हैं।
इस अबसर पर जिला के सभी उपसमाहर्ता, एस0डी0ओ0 अंजनी कुमार, डी0एस0पी0 सुबोध विश्वास के द्वारा जमकर आतिशबाजी किया गया । डी0 एल0पी0 क्लब के संरक्षक शैलेन्द्रकुमार , अध्यक्ष नवनीत कुमार और सचिव कुमार मंडे जी के द्वारा सारी व्यवस्था किया गया था । इस कार्यक्रम में शहर के लाखों लोगों ने अपनी आंखो से देखकर जमकर सराहा ।
विजयदशमी से हमें यही संदेश मिलता है कि असत्य चाहे जितना बलवान हो उसे अंत में हारना होता है। असत्य का अंत कब होता है, इसकी शायद कोई सीमा नहीं होती, लेकिन हमारी चेतना में यह विचार हमेशा रहना चाहिए कि असत्य और बुराई की एक न एक दिन पराजय अवश्य होगी। रावण का राज आतंक, अनाचार, शोषण एवं अत्याचार का प्रतीक था, जबकि मर्यादा पुरुषोत्ताम राम सत्य, समर्पण और सेवा के मार्ग पर चल रहे थे। उन्होंने सत्य की अपनी लड़ाई में सामान्य जनमानस को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपने साथ आने के लिए आमंत्रित किया, बल्कि यह कहें कि निवेदन किया। इसके विपरीत रावण अपनी ताकत पर मतवाला था। उसने नेक सलाह भी नहीं मानी, यहां तक कि ऐसी सलाह को भी दरकिनार कर दिया जो खुद उसके जीवन के लिए महत्वपूर्ण थी। इस मार्ग पर चलते हुए रावण का पतन सुनिश्चित था। स्पष्ट है कि हमें सदाचरण से कभी दूर नहीं होना चाहिए। सदाचरण ही वह शक्ति है जो हमें अंदर से मजबूत बनाती है और यही असली ताकत भी है। बाहरी शक्तियां हम कितनी भी जुटा लें, अगर हमारा चरित्र दुर्बल है, हमें अच्छे-बुरे का अहसास नहीं है तो वे सभी वाह्य शक्तियां एक-एक कर क्षीण हो जाएंगी। अपनी गलतियों के हम सबसे बड़े सचेतक हैं। इसलिए आत्मचिंतन की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए।
भगवान राम ने संतों को आश्रय दिया, उनकी सुरक्षा की और समाज में उन्हें ऊंचा स्थान दिलाया। वह अपने जीवन में कदम-कदम पर मानवता की रक्षा के लिए अपने सुखों का बलिदान करते रहे। असुर रूपी शक्तियां हर युग में मौजूद होती हैं, उनके दमन के लिए राम जैसे चरित्र की आवश्यकता होती है। विजयदशमी से हमें यह भी सबक मिलता है कि हम किसी को छोटा और हीन न समझकर सताएं नहीं। अगर किसी गुण के कारण हमें धन प्रसिद्धि मिल भी जाए तो अपने आचरण के प्रति और सतर्क हो जाएं, क्योंकि जितना हम प्रकाश में होते हैं उतना ही अधिक लोगों की निगाह में आते हैं।
इस अबसर पर जिला के सभी उपसमाहर्ता, एस0डी0ओ0 अंजनी कुमार, डी0एस0पी0 सुबोध विश्वास के द्वारा जमकर आतिशबाजी किया गया । डी0 एल0पी0 क्लब के संरक्षक शैलेन्द्रकुमार , अध्यक्ष नवनीत कुमार और सचिव कुमार मंडे जी के द्वारा सारी व्यवस्था किया गया था । इस कार्यक्रम में शहर के लाखों लोगों ने अपनी आंखो से देखकर जमकर सराहा ।


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