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Tuesday, 15 October 2013

ईद-उल-अजहा (बकरीद)


लखीसराय  बडी दरगाह , छोटी दरगाह, और हाजी मस्जिद पचना रोड में बकरीद के अबसर पर सामुहिक नमाज की जाती है।
 ईद-उल-अजहा (बकरीद) त्योहार इस्लाम धर्म के अंतिम दूत पैगम्बर हजरत इब्राहिम अलेहिस्सलाम की याद में मनाई जाती है। जिसने खुदा से सच्ची मुहब्बत करने व रखने का सबूत अपने इकलौते बेटे हजरत इस्लाम की कुर्बानी देकर पेश किया। उसी समय से बकरीद के मौके पर जानवर की कुर्बानी देने का सिलसिला शुरू हो गया।मुस्लिम समुदाय का महत्वपूर्ण त्योहार ईद उल जोहा (बकरीद) का त्योहार शांतिपूर्ण मनाए जाने को लेकर जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक ने संयुक्त आदेश जारी कर सभी संवेदनशील स्थानों तथा ईदगाहों व मस्जिदों पर दंडाधिकारी के साथ सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती की है। ड्यूटी पर लगाए गए सभी दंडाधिकारी एवं पुलिस पदाधिकारी को 16 अक्टूबर के अपराह्न तक निर्धारित स्थानों पर बने रहने का आदेश दिया गया है। एसडीओ एवं एसडीपीओ सुबोध कुमार संयुक्त रूप से विधि व्यवस्था की कमान संभालेंगे। जिला प्रशासन ने लखीसराय नगर परिषद एवं ग्रामीण क्षेत्र, कजरा बाजार, उरैन, बड़हिया नगर, सूर्यगढ़ा, मेदनी चौकी बाजार, पीरी बाजार, हलसी बाजार, नरौना कब्रिस्तान आदि संवेदनशील स्थानों पर विशेष चौकसी रहेगी।  जिला प्रशासन ने बिहार प्रिजर्वेशन एण्ड इम्पू्रवमेंट ऑफ एनिमल एक्ट 1935 की धारा तीन के तहत गाय एवं गाय के बछड़े, भैंस का बछड़ा के वध पर प्रतिबंध लगाया है।
 आज एक हिन्दु राजपुत राजु सिंह मो0 पैगम्बर साहब की त्याग और बलिदान से प्रभावित होकर मो0 मस्तान बन गया और आज की बकरीद का सामुहिक नमाज में शामिल होकर हिन्दु-मुस्लिम एकता और अखंडता का परिचय दिया है
V.01...एमएस कादरी ने बताया कि बकरीद त्योहार अच्छाई के रास्ते पर चलने का पैगाम देता है। उन्होंने कहा आज जरूरत है जानवरों की कुर्बानी देने की नहीं बल्कि इंसान अपने नफ्स (इच्छा) की भी कुर्बानी दें। जब ईश्वर ने हजरत इब्राहिम की भक्ति को परखने के लिए एक दिन कहा तुम अपनी सबसे कीमती चीज अल्लाह की राह में कुर्बान करो। हजरत साहब ने अपने सबसे प्यारा व कीमती अपने पुत्र इस्माइल के गर्दन पर छुरी चलाई और जब आंख पर से पट्टी खोली तो बेटे की जगह एक बकरा का जबह किया हुआ पाया।
हर साल कुर्बानी के नाम पर सबाब (पुण्य) कमाने की नीयत से लाखों करोड़ों की संख्या में जानवरों को हलाल कर जीभर लोग गोस्त खाते व खिलाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि आज जानवरों की कुर्बानी देने वाला तो बहुत है मगर इंसानियत की खातिर खुद को कुर्बान करने वाला ना के बराबर है। सच्चे मुसलमान वे हैं जो दूसरे की भलाई व तरक्की के लिए अपने जरूरतों को कुर्बान कर देते हैं। कुर्बानी के नाम पर जानवरों को जितना हलाल किया जाता है अगर उसी जानवर को बेचकर उस पैसे का सही इस्तेमाल हो तो कमजोर मुसलमानों की जिंदगी अच्छी नहीं बेहतर हो सकती है।

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