बड़ी दुर्गा महारानी
लखीसराय शहर की हृदय स्थली नया बाजार दालपट्टी बड़ी दुर्गा मंदिर शहरवासियों के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है। जहां भक्त मां भगवती की पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगते हैं और भक्तों की हर मुराद पुरी होती है। इस मंदिर का नवनिर्माण श्री संयुक्त समिति की देखरेख में वर्ष 2000 में शुरू हुआ जो निरंतर जारी है। मंदिर समिति के मंत्री देवनंदन प्रसाद के अनुसार शहर का पहला पौराणिक देवी मंदिर है जहां लोगों की असीम आस्था जुड़ी है। छोटे पैमाने पर शुरू हुई पूजा धीरे-धीरे विस्तारित होती गई और आज भव्य मंदिर आकर्षण व आस्था का केंद्र बना हुआ है।
मंदिर की स्थापना का इतिहास
श्री छोटन साह इस संस्था के संस्थापक सचिव थे। जिन्होने नया बाजार दालपटटी मुहल्ला के सभी गोलेदारों और अन्य व्यवसायीयों के सहयोग से विती के द्वारा श्री रामलला ठाकुरबाडी का निर्माण करवाया । फिर उन्होने इसी संस्था के माध्यम से अष्टधटी तालाव के पास दुसरा ठाकुरबाडी का निर्माण करवाया । फिर उन्होने लालजी साह, गेन्दी साव, जागो साव, आदि लोगों के सहयोग 1893 ई0 में श्री संयुक्त समिति का निर्माण किया । जिसमें पारंम्परिक तरीके से जगतजननी जगदम्बा की पुजा अर्चना प्रारम्भ किया गया । संस्था के संस्थापक सचिव छोटन साह 1982 ई0 में स्वर्गवास हो गए । तब समाज के कई लोगों ने इस मंदिर की जिम्मेवारी उठाया । जिसमें धीरे-धीरे कई लोग जुड गये। जैसे महावीर साव, रामखेलावन साव, बालेश्वर साव, नुनुचन्द साव, प्रभुचन्द साव आदि लोगोंनेसंस्था में आकर काफी कुछ काम किया । तीसरा पीढी आए जिसमेंसुरेश साव, दिनेश साव, अनील कुमार, देवनंदन साव आए जिन्हाने संस्था को एक नया दिशा दिया और चैथी पीढी को जोडने का काम किया । जिसमेंउमापति पोद्वार, अरूण कुमार, रंजीत सम्राट, डा0 प्रवीण कुमार सिन्हा, अरविन्द कुमार , मथुरा साव, विष्णुदेव कुमार, आदि युवाओं को लाए । उसके बाद फिर शुरू हो गया मंदिर में राजनिति का दौर ! और आज कुछ लोग देवनंदन बाबु की गतिविधि से क्षुब्ध होकर मंदिर की गंदी राजनिति से संन्यास ले लिया । अभी देवी मंदिर आज भी पौराणिक श्रद्वा और विश्वास केसाथ हर भक्तों का मनोकामना को माता पुरी करती है। हालांकि कुछ लोग इस महौल को बिगाडने की कुत्सित प्रयास कर रहे है। लेकिन मांजगदम्बा की महिमा अपरमपार है। सभी भक्तों की अबगुणों को हर कर सद्गुणों की विचार प्रदान कर सबका कल्याण कर रही है।
श्री संयुक्त समिति बड़ी दुर्गा मंदिर के अनुसार 1893 में मंदिर की स्थापना के बाद वर्ष 2000 में मंदिर निर्माण के लिए रामलला ठाकुरबाड़ी, बड़ी दुर्गा स्थान एवं अष्टघटी मंदिर का संचालन किया जा रहा है। वर्षो पहले से यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा और मेला का आयोजन किया जाता है।
बड़ी दुर्गा मंदिर की वास्तुकला
108 फीट उंची इस भव्य मंदिर का गुंबद दक्षिण भारत के तेलंग बंधु ने तैयार किया था। गुंबद की नक्कासी आकर्षण का केंद्र है। इसके अलावा स्थानीय कारीगर भरत पंडित, चंद्रदेव पंडित सहित अन्य कारीगरों ने इस मंदिर भवन को तैयार किया। रात के अंधेरे में दुधिया बल्ब की रोशनी में यह मंदिर दूर से ही अपनी कला को प्रदर्शित करती है।
मंदिर की विशेषता
बड़ी दुर्गा जी के रूप में हर श्रद्धालुओं की आस्था बन चुकी मां भगवती की पूजा अर्चना विद्वान ब्राह्माणों की देखरेख में पूरी पवित्रता के साथ हर साल होती है। नवरात्र में अष्टमी, नवमी को बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु बड़ी दुर्गा को खोइंचा भरकर मनौती मांगती है। बताया जाता है कि मां की आस्था यहां खुद लोगों को अपनी ओर खींच लाती है।पौराणिक काल से देवी पूजा हो रही है !
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लखीसराय शहर की हृदय स्थली नया बाजार दालपट्टी बड़ी दुर्गा मंदिर शहरवासियों के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है। जहां भक्त मां भगवती की पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगते हैं और भक्तों की हर मुराद पुरी होती है। इस मंदिर का नवनिर्माण श्री संयुक्त समिति की देखरेख में वर्ष 2000 में शुरू हुआ जो निरंतर जारी है। मंदिर समिति के मंत्री देवनंदन प्रसाद के अनुसार शहर का पहला पौराणिक देवी मंदिर है जहां लोगों की असीम आस्था जुड़ी है। छोटे पैमाने पर शुरू हुई पूजा धीरे-धीरे विस्तारित होती गई और आज भव्य मंदिर आकर्षण व आस्था का केंद्र बना हुआ है।
मंदिर की स्थापना का इतिहास
श्री छोटन साह इस संस्था के संस्थापक सचिव थे। जिन्होने नया बाजार दालपटटी मुहल्ला के सभी गोलेदारों और अन्य व्यवसायीयों के सहयोग से विती के द्वारा श्री रामलला ठाकुरबाडी का निर्माण करवाया । फिर उन्होने इसी संस्था के माध्यम से अष्टधटी तालाव के पास दुसरा ठाकुरबाडी का निर्माण करवाया । फिर उन्होने लालजी साह, गेन्दी साव, जागो साव, आदि लोगों के सहयोग 1893 ई0 में श्री संयुक्त समिति का निर्माण किया । जिसमें पारंम्परिक तरीके से जगतजननी जगदम्बा की पुजा अर्चना प्रारम्भ किया गया । संस्था के संस्थापक सचिव छोटन साह 1982 ई0 में स्वर्गवास हो गए । तब समाज के कई लोगों ने इस मंदिर की जिम्मेवारी उठाया । जिसमें धीरे-धीरे कई लोग जुड गये। जैसे महावीर साव, रामखेलावन साव, बालेश्वर साव, नुनुचन्द साव, प्रभुचन्द साव आदि लोगोंनेसंस्था में आकर काफी कुछ काम किया । तीसरा पीढी आए जिसमेंसुरेश साव, दिनेश साव, अनील कुमार, देवनंदन साव आए जिन्हाने संस्था को एक नया दिशा दिया और चैथी पीढी को जोडने का काम किया । जिसमेंउमापति पोद्वार, अरूण कुमार, रंजीत सम्राट, डा0 प्रवीण कुमार सिन्हा, अरविन्द कुमार , मथुरा साव, विष्णुदेव कुमार, आदि युवाओं को लाए । उसके बाद फिर शुरू हो गया मंदिर में राजनिति का दौर ! और आज कुछ लोग देवनंदन बाबु की गतिविधि से क्षुब्ध होकर मंदिर की गंदी राजनिति से संन्यास ले लिया । अभी देवी मंदिर आज भी पौराणिक श्रद्वा और विश्वास केसाथ हर भक्तों का मनोकामना को माता पुरी करती है। हालांकि कुछ लोग इस महौल को बिगाडने की कुत्सित प्रयास कर रहे है। लेकिन मांजगदम्बा की महिमा अपरमपार है। सभी भक्तों की अबगुणों को हर कर सद्गुणों की विचार प्रदान कर सबका कल्याण कर रही है।
श्री संयुक्त समिति बड़ी दुर्गा मंदिर के अनुसार 1893 में मंदिर की स्थापना के बाद वर्ष 2000 में मंदिर निर्माण के लिए रामलला ठाकुरबाड़ी, बड़ी दुर्गा स्थान एवं अष्टघटी मंदिर का संचालन किया जा रहा है। वर्षो पहले से यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा और मेला का आयोजन किया जाता है।
बड़ी दुर्गा मंदिर की वास्तुकला
108 फीट उंची इस भव्य मंदिर का गुंबद दक्षिण भारत के तेलंग बंधु ने तैयार किया था। गुंबद की नक्कासी आकर्षण का केंद्र है। इसके अलावा स्थानीय कारीगर भरत पंडित, चंद्रदेव पंडित सहित अन्य कारीगरों ने इस मंदिर भवन को तैयार किया। रात के अंधेरे में दुधिया बल्ब की रोशनी में यह मंदिर दूर से ही अपनी कला को प्रदर्शित करती है।
मंदिर की विशेषता
बड़ी दुर्गा जी के रूप में हर श्रद्धालुओं की आस्था बन चुकी मां भगवती की पूजा अर्चना विद्वान ब्राह्माणों की देखरेख में पूरी पवित्रता के साथ हर साल होती है। नवरात्र में अष्टमी, नवमी को बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु बड़ी दुर्गा को खोइंचा भरकर मनौती मांगती है। बताया जाता है कि मां की आस्था यहां खुद लोगों को अपनी ओर खींच लाती है।पौराणिक काल से देवी पूजा हो रही है !
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